रानी लक्ष्मीबाई — कविता जोशी

(अंतर्नाद)

अरे! यह कैसी मची है बाहर हलचल,
क्यों हो रहा है इतना कोलाहल ?

ओह! ये तो शत्रु सैनिक हैं ,
जो गा रहे हैं मेरी प्रशंसा के गीत ।
कह रहे हैं- कैसे मुझ दुस्साहसी ने,
हारी हुई बाजी ली है जीत ।

आह! काल के क्रूर हाथों ने ,
छीन लिया आज जीवन मेरा ।
यदि जीवित रहती तो सोच, हे अरि !
क्या हाल होता तेरा।

मेरी बारंबार विजय से
तू ऐसा बौखलाया कि
पीरबख्श, दुल्हाज़ू जैसे
विश्वासघातियों को ही पकड़ लाया ।

यद्यपि पीठ पीछे वार करके
प्राण तूने हर लिए ,
तथापि प्रेरणा बन जाएगा
मेरा बलिदान उनके लिए –

जिनको होना है आज़ाद
गुलामी की ज़ंजीरों से,
लेना है उन्मुक्त श्वास
सम्मानित जिंदगी से ।

जैसे कल की ही बात हो ,

याद आ रहा है मुझे,
वह बचपन अपना ।
देखा था पंख लगाकर,
जब उड़ने का सपना ।

आई- बाबा की लाड़ली

मैं जब पहुंची काशी से
पेशवा बाजीराव के यहां बिठूर
तब सभी की आंखों का
एकमात्र मैं ही थी नूर।

प्यार से कहते थे सब मनु,
यद्यपि नाम था मेरा मणिकर्णिका ।
कुश्ती करने तलवार चलाने के साथ,
शौक था मुझे घुड़सवारी का ।

मिला जब नाना, तात्या, बाला,
जैसे मित्रों का साथ ।
किया मैंने भी उन्हीं के समान
गुणों को आत्मसात ।

बचपन से ही गुड्डे गुड़ियों से
न था मुझे कोई प्यार,
मुझे तो बस भाते थे
बंदूक और तलवार।

काशी बिठूर जैसे पवित्र नगरों से
मिले थे मुझे ऐसे शुभ संस्कार
जिसे किया था मैंने सहज
स्वाभाविक रूप से स्वीकार।

(वंदन)

हे रानी ! मैं ह्यूरोज़ मन ही मन
गा रहा हूं तेरी प्रशंसा के गीत ।
रण में नहीं थी तुम ,
जरा भी भयभीत ।

युद्ध भूमि में तुमने ,
चंडी का सा रूप धरा ,
हौसले थे बुलंद ,
साहस था खूब भरा ।

कल तक मैं जिसे ,
समझता था कोमल नारी।
वही पड़ गई मुझ पर,
बहुत ही भारी ।

जरा सी चोट खाते ही ,
तुम हो गई विकराल।
शत्रु सेना का हाल ,
तो और हुआ बेहाल ।

पीठ पर पुत्र को बांध
तुम बढ़ती गई आगे ।
दुश्मन हुआ पस्त
रण छोड़ सब भागे।

टूट पड़ी जब तुम रानी,
बनकर हम सब पर काल।
युद्धभूमि में आ गया,
मानो एक भूचाल ।

नारी शक्ति को एकत्र कर जो,
बनाई थी तुमने सैनिक टुकड़ी।
उस ‘लालकुर्ती’ ने तो मैदान में,
करामात ही कर डाली ।

धन्य हो तुम रानी और
धन्य है देश तुम्हारा ।
जहां की वीरांगनाएं भी,
लगाती हैं जय जयकारा।

(प्रण)

शांत पड़ी है आज वह,
संत गंगादास की कुटिया पर।
कोई फिरंगी न कर पाया मलिन,
मरणोपरांत भी उसका स्पर्श कर।

यह रानी ही थी जिसने,
ललकारा था दुश्मनों को ।
अपने दमखम पर किया,
नेस्तनाबूद अनेकों को।

नारी शक्ति की मिसाल,
है रानी लक्ष्मीबाई।
रण में जिसने अपनी
ताकत खूब दिखलाई।

1947 में मिली स्वतंत्रता है ,
रानी की ही सौगात ।
जिसके नेतृत्व की एक डोर ,
थी उसके ही हाथ ।

दे प्राणों का उत्सर्ग ,
किया रानी ने झांसी को भी अमर ।
और बनाई उसकी भी एक ,
सम्मानित जगह विश्व मानचित्र पर।

ऐसी महान नारी को हमारा नमन,
करते हैं आज हम मिलकर यह प्रण-

इतनी कठिनाइयों से मिली स्वतंत्रता को,
हम व्यर्थ यूं न जाने देंगे ।
करेंगे हम इसकी सुरक्षा,
इस पर कोई आंच न आने देंगे ।

कविता के माध्यम से जिसे,
किया है याद हमने इतना।
उस महान लक्ष्मीबाई के संदेश को ,
यूं व्यर्थ न जाने देना।

अब तो मुखर हों, न रहें मौन ,
पूछें खुद से कि आखिर हम हैं कौन ?
क्या यूं ही अत्याचार,अनाचार को सहते रहेंगे ,
या फिर इसका दमन करने की पहल भी करेंगे।

किसी एक को तो अब आगे आना ही होगा ।
सोए हुए दिलों को जोश दिलाना ही होगा ।।
आइए,सब एकजुट हो करें आज यह प्रण ।
बस अब और नहीं , न होगा करुण क्रंदन ।।

एक नवीन उज्जवल प्रभात के साथ ,
नव समय का हो रहा है आगमन ।
आइए,आशा विश्वास के साथ करें ,
हम उसका शत् शत् अभिनंदन ।

आज की नारी यदि ,
बन जाए वीरांगना ।
तो क्या हो पाएगी बलरामपुर,
हाथरस जैसी वीभत्स घटना ।

शक्तिपुंज का स्रोत है वह ,
साहस से ओतप्रोत है वह ,
अब न वह कभी कुचली जाएगी,
न दरिंदों से मात खाएगी।

वह तो अपने बल पर बस,
आगे बढ़ती जाएगी, आगे बढ़ती जाएगी।

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